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दो मासूमों के भविष्य को बचाया सुशीला ने (सफलता की कहानी)
बाल विवाह को हटाना समस्त समाज की जिम्मेदारी
अनुपपुर | 17-अप्रैल-2018
   
    यह सोच कर बड़ा अजीब लगता हैं कि वह भारत जो अपने आप में एक महाशक्ति के रूप में उभर रहा हैं उसमें आज भी एक कुरीति जिन्दा हैं। एक ऐसी कुरीति जिसमें दो अपरिपक्व लोगो को जो आपस में बिलकुल अनजान हैं उन्हें जबरन जिन्दगी भर साथ रहने के एक बंधन में बांध दिया जाता हैं और वे दो अपरिपक्व बालक शायद पूरी जिन्दगी भर इस कुरीति से उनके ऊपर हुए अत्याचार से उभर नहीं पाते हैं और बाद में स्तिथियाँ बिलकुल खराब हो जाती हैं और नतीजे तलाक और मृत्यु तक पहुच जाते हैं। बालविवाह के केवल दुस्परिणाम ही होते हैं जीनमें सबसे घातक शिशु व माता की मृत्यु दर में वृद्धि। साथ ही शारीरिक और मानसिक विकास पूर्ण नहीं हो पाता हैं। और वे अपनी जिम्मेदारियों का पूर्ण निर्वेहन नहीं कर पाते हैं।
 
   अनुपपुर के ग्राम बीजापुर मे दो नन्हें बच्चों के जीवन के साथ बाल विवाह का खिलवाड़ होने वाला था। समाज के एक जिम्मेदार प्रहरी ने इसकी सूचना महिला सशक्तिकरण अधिकारी श्रीमती मंजूषा शर्मा को दी। सूचना प्राप्त होते ही श्रीमती शर्मा ने मामले की गंभीरता को समझकर जरा भी देर किए बिना सुपरवाइजर सुशीला बघेल को आवश्यक मार्गदर्शन किया। सुशीला जो कि इस कार्य को अपना नैतिक दायित्व भी समझती हैं ने पुलिस बल के साथ समन्वय स्थापित करते हुए रात्रि में मौके पर पहुँचकर बाल विवाह रूकवाया और दो मासूमो की जिंदगी को बर्बाद होने से बचा लिया।
    भारत में बालविवाह होने के कई कारण हैं जैसे-लड़की की शादी को माता-पिता द्वारा अपने ऊपर एक बोझ समझना, शिक्षा का अभाव,  रूढ़िवादिता का होना,  अन्धविश्वास आदि। बालविवाह को रोकने के लिए इतिहास में कई लोग आगे आये जिनमें सबसे प्रमुख  राजाराम मोहन राय,  केशबचन्द्र सेन जिन्होंने ब्रिटिश सरकार द्वारा एक बिल पास करवाया जिसे Special Marriage Act कहा जाता हैं इसके अंतर्गत शादी के लिए लड़को की उम्र 18 वर्ष एवं लड़कियों की उम्र 14 वर्ष निर्धारित की गयी एवं इसे प्रतिबंधित कर दिया गया। फिर भी सुधार न आने पर बाद में Child Marriage Restraint नामक बिल पास किया गया इसमें लड़को की उम्र बढ़ाकर 21 वर्ष और लड़कियों की उम्र बढ़ाकर 18 वर्ष  कर दी गयी। स्वतंत्र भारत में भी सरकार द्वारा भी इसे रोकने के कही प्रयत्न किये गए और कई कानून बनाये गए जिस से कुछ हद तक इनमे सुधार आया परन्तु ये पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हुआ। सरकार द्वारा कुछ क़ानून बनाये गए हैं जैसे बाल-विवाह निषेध अधिनियम 2006 जो अस्तित्व में हैं। ये अधिनियम बाल विवाह को आंशिक रूप से सीमित करने के स्थान पर इसे सख्ती से प्रतिबंधित करता है। इस बुराई को पूर्णतया समाप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि सम्पूर्ण समाज अपनी जिम्मेदारी को समझे, जहां कहीं भी बाल विवाह की चर्चा भी हो रही हो उन्हे हतोत्साहित करे, इसके दुष्परिणामों को समझाएँ। आवश्यकता पड़ने मे शासन का सहयोग भी ले। ऐसा करके न केवल आप दो जिंदगियों को खराब होने से बचाएगे वरन अगली पीढ़ी जो कि शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर होती उसकी भी रक्षा हो जाएगी। अगर समस्त समाज सेवा प्रदाताओं समेत इस जिम्मेदारी को समझ लेगा तो हमे इस व्यवस्था को मिटाने  के लिए कानून रूपी बल की आवश्यकता नहीं होगी। तभी सही मायने मे हम अग्रणी राष्ट्र होने का दर्जा प्राप्त कर सकेंगे। आज सभी को आवश्यकता है कि वे भी सुशीला जी जैसे सक्रिय रहे। और समाज से इस बुराई को मिटा दे।
(4 days ago)
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