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पुरातत्वीय सर्वेक्षण में 9वीं शती से 18वीं शती तक की पुरातत्वीय धरोहर मिली
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उज्जैन | 14-फरवरी-2018
 
 
     पुरातत्व विभाग द्वारा बुन्देलखण्ड क्षेत्र एवं आसपास के जिलों में कराए गए पुरातत्वीय सर्वेक्षण में कई ऐतिहासिक पुराव-शेष, मंदिर, मूर्तिकला, देवी-देवताओं की प्राचीन दुर्लभ मूर्तियाँ प्रकाश में आयी हैं। पुरातत्व आयुक्त श्री अनुपम राजन ने जानकारी देते हुए बताया है कि पुरातत्वीय सर्वेक्षण में कई महत्वपूर्ण और 9वीं शती से लेकर 18वीं शती तक की पुरातत्वीय धरोहर को खोज निकाला है।
    पन्ना टाईगर रिजर्व के बफर जोन में चित्रित शैलाश्रय महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यहाँ के शैलचित्र महापाषाण एवं ताम्रपाषाण-कालीन मानव गतिविधियों के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं। पन्ना नेशनल पार्क के सर्वेक्षण में पांडव गुफा स्थल पर प्राकृतिक गुफाओं का उपयोग करते हुए चूना-ईंट प्रस्तर निर्मित 16-17वीं शती ई. के विश्राम-गृह मिले हैं। यहीं कुछ दूरी पर चूने-ईंट एवं प्रस्तर से निर्मित 16-17वीं शती ई. काल की चहारदीवारी, सुरक्षा चौकी एवं भवन बुन्देल-कालीन शिल्प-कला के प्रमाण मिले हैं। इनके अलावा जैन मंदिर, जुगल किशोर मंदिर, गढ़ी एवं दो स्थल पर निर्मित शिकारगाह भी वास्तुकला के क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं।
    दमोह जिले में वीरांगना रानी दुर्गावती अभ्यारण्य में किये गये सर्वेक्षण में सिंगोरगढ़ किला के अतिरिक्त निदान मड़ई में मठ, मंदिर के अवशेष एवं प्राचीन प्रतिमाएँ, रतनटोडिया एवं बावन बजरिया से कलचुरी-कालीन प्राचीन चिन्हित हुई हैं। दौनी लकवाई से कलचुरि-कालीन के लगभग 15 मंदिरों के समूह के भग्नावशेष प्रकाश में आये हैं। रानी दुर्गावती उद्यान जबेरा से 10-11वीं शती ई. की प्रतिमाएँ चिन्हिंत हुई हैं।
    शिवपुरी जिले में स्थित माधव राष्ट्रीय उद्यान में पुरातत्वीय सर्वेक्षण में अमर-नदी के तट पर चूरन छाज (चुड़ेल का निवास) नामक स्थान से चित्रित शैलाश्रय प्राप्त हुए हैं। यहाँ से चिन्हांकित शैलचित्र 8-9 हजार वर्ष इस क्षेत्र में आदि-मानव गतिविधियों की पुष्टि करते हैं। शैलचित्रों के चित्रण में हिरण, सांभर, सियार एवं सांप आदि के चित्र प्रमुख हैं। इसके अलावा यहाँ बलारपुर नामक स्थान पर प्राचीन मंदिर के अवशेष एवं तीन गर्भगृह वाला भग्नावस्था में जैन मंदिर मूल-स्वरूप में प्रकाश में आया है। बलारपुर माता मंदिर यद्यपि आधुनिक है किन्तु इसमें संयुक्त ब्राम्हण देवी-देवता यथा शेषशायी विष्णु, स्थानक गणेश एवं देविओं की प्रतिमाओं पर 11-12वीं शती ई. के विशाल विष्णु मंदिर होने के प्रमाण मिले हैं। इन मंदिरों के अलावा जैन तीर्थंकर प्रतिमाएँ, पार्वती आदि की प्रतिमाएँ प्राप्त हुईं हैं और बलारपुर से ही शिव एवं भैरव मंदिर भग्नावस्था में चिन्हांकित हैं। इसके अतिरिक्त चांदवारा तालाब के किनारे 1919 में निर्मित संख्यासागर सैलिंग क्लब और चांदवारा तालाब की दीवार, शूटिंग बाक्स, गोल्फ टावर तथा भूराखों नाले के समीप विश्राम गृह तथा कटामा बीट में दो मंजिला टावर पुरातत्वीय दृष्टि से महत्वपूर्ण स्मारक हैं। शिवपुरी जिले में ही "करेरा वन्य प्राणी अभ्यारण्य "स्थित है। रोनिजा नाम स्थान पर विशाल गढ़ी, छत्रियाँ, ग्राम निकोरा में भी गढ़ी, बावड़ी में गौ-मुख एवं प्रतिमाएँ तथा ग्राम तिरसा में भी प्राचीन गढ़ी चिन्हांकित हुई हैं। यह सभी 17-18 वीं ई. में निर्मित होना पाया जाता है।
    नौरादेही अभ्यारण्य सागर, दमोह एवं नरसिंहपुर जिले में 6 गेम परिक्षेत्र में विस्तारित है।  इसमें 3 सागर में, 2 दमोह और 1 परिक्षेत्र नरसिंहपुर जिले में हैं। पुरातत्वीय सर्वेक्षण में सागर जिले के मोहली गेम परिक्षेत्र में ग्राम मोहली से 19वीं शती ई. की दो छत्रियाँ, जैन मंदिर तथा जैन मंदिर में स्थापित 15-16 प्रतिमाएँ, इसी परिक्षेत्र के सीमांत पहाड़ी कालिका मठ से चंदेल-कालीन 2 मंदिरों के भग्नावशेष एवं प्राचीन प्रतिमाएँ प्रकाश में आयी हैं। डोंगर गाँव जिला नरसिंहपुर से एक शैलाश्रय एवं धार्मिक स्थान प्रकाश में आया है। इस धार्मिक स्थान का संबंध आदि शंकराचार्य के गुरु गौडपादाचार्य से माना जाता है। किन्तु शैलाश्रय लगभग 10 हजार वर्ष प्राचीन हैं।
    पन्ना एवं छतरपुर जिले में विस्तृत "केन अभ्यारण्य " के सर्वेक्षण में गुमान की गढ़ी स्थल से गौंड राजा गुमान सिंह द्वारा 17-18वीं शती ई. की अनुमानित निर्मित गढ़ी चिन्हिंत हुई है। इस गढ़ी से तकरीबन 3 किलोमीटर दूर केन नदी के रपटा पर स्थित सदाशिव प्रतिमा के आसपास में शिवमंदिर होने का अनुमान है। ग्राम अकैना से आधुनिक हनुमान मंदिर में 19वीं शती ई. के हनुमान प्रतिमा, 12वीं शती का विष्णु प्रतिमा मस्तक, ग्राम हरसा से 18वीं शती ई. में निर्मित गढ़ी के अवशेष, 13 से 18वीं शती की देवी-देवताओं की 16 प्रतिमा, एवं ग्राम कड़ई से भी 18वीं शती के गढ़ी के अवशेष तथा 13वीं शती ई. की प्रतिमाएँ एवं अन्य शिल्पखंड प्रकाश में आये हैं।
    राष्ट्रीय चंबल अभ्यारण्य तीन राज्य मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश एवं राजस्थान के विशाल क्षेत्र में विस्तृत है।  इस अभ्यारण्य के अंतर्गत मघ्यप्रदेश में आने वाले क्षेत्र के सर्वेक्षण में फतेहपुर ग्राम के रामेश्वरम धाम नामक स्थान से 3 शिवमंदिर, लक्ष्मीनारायण् मंदिर एवं गौड़ राजाओं के काल की छत्रियाँ प्रकाश में आयी हैं। रामेश्वरम धाम के अतिरिक्त मानपुर की गढ़ी, कृष्ण-गोपाल मंदिर, रेणुका मंदिर, गिरधरपुर (हीरापुर) की गढ़ी, ग्राम ढोठर स्थित गढ़ी एवं गोपाल सिंह की हवेली, गिरिराज धारण मंदिर (गढ़ी) ओझापुर की गढ़ी, देवगढ़ की हवेली, सरसैनी स्थित दो गढ़ी, ग्राम बावड़ी स्थित मंदिर 18-19 वीं शती ई. के महत्वपूर्ण स्मारक हैं। ग्राम हुसैनपुरा स्थित गढी-सराय, ग्राम सैथहा अहिर से चिन्हांकित शिवमंदिर, ग्राम पोढ़ स्थित 19वीं शती का आश्रम, यज्ञशाला, अटेर स्थित भदावर शासकों का किला एवं किले के ब्राह्य भाग में स्थित  शिव मंदिर, ग्राम कोषण से उत्खनन में प्राप्त गुप्तकालीन शिव मंदिर के अवशेष, ग्राम वोरेश्वर स्थित शिव मंदिर, ग्राम बरही स्थित जैन मंदिर का जीर्णोद्धार कर नवीन रूप दिया गया है पर मंदिर में प्रतिस्थापित अजितनाथ, अरनाथ, कुंथनाथ एवं शांतिनाथ एवं अन्य तीर्थंकर की प्रतिमाएँ 9-10वी शती की हैं। जबकि कांस्य निर्मित महावीर स्वामी की प्रतिमा पर विक्रम संवत 1533 उत्कीर्ण है।
    पुरातत्व आयुक्त श्री राजन ने बताया कि इन स्थलों का अनुरक्षण एवं विकसित कर मध्यप्रदेश के "ईको पर्यटन" को नया आयाम दिया जा सकेगा। इस संबंध में वन विभाग को पुरातत्वीय सर्वेक्षण प्रतिवेदन तैयार कर भिजवाया गया है।
 
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