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गाय केवल दूध देने वाली नही, गौमूत्र-गोबर परिवार की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ कर सकती है- ब्रम्हचारी श्री विनय (सदस्य म.प्र. पशु संवर्धन)
गौशालाएं अनुदान की राशि से गौशालाओं को बनाए स्वावलंबी, गोबर से लकड़ी, कीटनाशक, फिनाईल, गमले बनाए, जिला गौपालन एवं पशुधन संवर्धन समिति की बैठक सह कार्यशाला आयोजित
राजगढ़ | 13-सितम्बर-2017
 
  
   गाय केवल दूध देले वाली पशु नही है। गौ-मूत्र और गोबर, लकड़ी, कीट-नाशक, फिनाईल, गमले, दीपक, मूर्तियां और गोबर गैस प्लांट से विद्युत उत्पादन करें। प्रयास करें गौवंशीय पशु पूरे परिवार को अकेले पालेगी, आर्थिक व्यवस्था सुदृढ़ करेगी और  विकास के सभी रास्ते खोलेगी। शासन द्वारा दिए जाने वाले अनुदान से गौशालाओं को आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बनाएं। यह उदगार जैन मुनि विद्या सागर के शिष्य ब्रम्हचारी तथा सदस्य म.प्र. पशुधन संवर्धन श्री विनय ने जिला गौ-पालन एवं पशुधन संवर्धन समिति की बैठक सह कार्यशाला में व्यक्त किए। इस अवसर पर कलेक्टर श्री कर्मवीर शर्मा, अनुविभागीय अधिकारी राजस्व राजगढ़ श्रीमति ममता खेड़े, उप संचालक पशु चिकित्सा डॉ. ओ.पी. गौर, जिले की समस्त गौशालाओं के अध्यक्ष, प्रबंधक, व्यवसाई एवं गौ-प्रेमी जबलपुर श्री आलोक जैन मौजूद रहे।
   उन्होंने कहा कि गौशालाओं का संचालन गौवंशीय पशुओं के बिखराव को रोकने के लिए नही बल्कि उसका सदुपयोग करने के उद्देश्य से किया जाए। गौपालन को वास्तविक धन लाभ गाय के दूध के मात्र बेचने नही बल्कि गौ-मूत्र और गोबर के सदुपयोग से है। गौ-मूत्र से औषधी बनाकर व्यक्ति और खेती का ईलाज हो सकता है एवं गौ-मूत्र से कीट नाशक तथा गोबर से घरो में खाना बनाने के लिए गैस या इसी गैस से बिजली और अंत में बचे शेष से जैविक खाद बनाई जा सकती है। जैविक खाद रसायनिक खाद से ज्यादा अच्छी और महत्वपूर्ण है। इससे खेत बंजर नही होंगे, उत्पादकता बढ़ेगी और जैविक खाद से उत्पादित खाद्यान्न की बाजार में बहुत मांग है एवं कीमत भी बहुत अच्छी मिलती है।
   प्रारंभ में कलेक्टर श्री शर्मा ने कार्यशाला के उद्देश्य बताए तथा कहा कि जिले में गौवंशीय पशुधन बहुत है। पशुपालक इसे पशु समझ कर स्वतंत्र छोड़ देते है। गाय हमारी संस्कृति से जुड़ा संवेदनशील मामला है। गौपालक जब तक गाय देती है तब तक घर में रखते है जब तक वह दूध देती है। बाद में उसे सड़कों पर छोड़ दिया जाता है। जिससे उनकी कई बार दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है। उन्होंने कहा कि पालक इसे पशु नही पशुधन समझें। इससे मिलने वाले बहुमूल्य उत्पाद को जाने, उपयोग करें और लाभ कमाएं। उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन सामाजिक दायित्वों के निर्वहन के साथ-साथ लोगों में संस्कृति को सहेजने आर्थिक उन्नति के लिए पशुपालन को लाभ का धंधा बनाने के उद्देश्य से जिले की गौ सेवा सदन जीरापुर, कमल गौशाला नरसिंहगढ़, कपिलेश्वर गौशाला सारंगपुर तथा मानस गीता गौशाला नरसिंहगढ़ में पायलट प्रोजेक्ट के तहत गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने, गौमूत्र से औषघी, कीटनाशक, फिनाईल आदि तथा गोबर से गोबर गैस, लकडी, गमले, दीपक, मूर्तियां और अगरबत्ति निर्माण के लिए लिये गए हैं। गौपालक गौमूत्र और गोबर के महत्व को समझ सकेंगे। यह महिलाओं की अतिरिक्त आय का जरिया बनेगा और ग्रामीण क्षेत्रों मे स्वरोजगार के साथ-साथ आर्थिक उन्नति के लिए महत्वपूर्ण परिवर्तन परिलक्षित होगा।
   इस अवसर पर श्री आलोक जैन द्वारा गौवंशीय अपशिष्ट से उत्पादित होने वाली सामग्रियों की जानकारी दी तथा पशुधन का सदुपयोग करने प्रेरित किया गया।
(11 days ago)
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